Friday, 25 March 2016

ये कैसी हैप्पी होली है?

what kind of happy holi is this
इस लेख को लिखने से पहले मैंने कई बार सोचा कि इस लेख को लिखने का फ़ायदा ज़्यादा है या नुक़सान? फ़ायदे से मेरा मतलब ये है कि क्या इस लेख को लिखने के बाद मैं इस तरह की घटनाओं में कुछ कमी देखूँगा? नुक़सान से मेरा तात्पर्य ये है कि इस लेख को पढ़ने के बाद मेरे देश की छवि और आने वाले विदेशी पर्यटकों पर इस का क्या प्रभाव होगा? ख़ैर इस नफ़े और नुक़सान की उधेड़ बुन से निकल कर मैंने इस लेख को हिंदी में लिखने का फ़ैसला किया। ये फ़ोटो धुलंडी से एक दिन पहले होली दहन के वक़्त खिंची हुई है।

ये महिला एक कनेडियन फ़ोटोग्राफ़र हैं जो भारत भ्रमण पर आई हुई हैं। इसी संदर्भ में मैं इनकी सहायता कर रहा था और इनके साथ था। इन्हें भारत में कुछ दिन हो गए हैं और इन्हें हमारा देश काफ़ी पसंद भी आ रहा था।

बात धुलंडी वाले दिन की है। मैं सुबह से ही इन्हें साथ लेकर जयपुर भ्रमण कर रहा था। हमारा दिन काफ़ी अच्छा गुज़र रहा था, इनको भारत की होली देखनी थी तो मैं इन्हें शहर ले गया। हम गाड़ी की चार दीवारी मे बंद रह कर ही खिड़की से शहर में लोगों को होली खेलते और हुड़दंग मचाते देख रहे थे और उनकी तस्वीरें खींच रहे थे। मैंने इन्हें चेता भी दिया था कि गाड़ी से बाहर निकलना ठीक नहीं रहेगा। ख़ैर, हम गाड़ी में घूमते-घूमते शहर के एक मुख्य मार्ग के एक मुख्य स्थान के सामने जा पहुँचे जहाँ होली कुछ ज़्यादा ही धूम-धाम से मनायी जा रही थी, लोग नाच रहे थे, गा रहे थे और सभी अपनी मस्ती में मस्त थे। भीड़ ज़्यादा होने की वजह से गाड़ी से फ़ोटो लेना काफ़ी कठिन साबित हो रहा था। मैं रोक पाता इस से पहले यें गाड़ी से कुछ अच्छी तस्वीरें खींचने को उतर गयीं। मैंने तुरंत फ़ैसला किया कि मुझे इनकी मदद के लिए उतरना होगा। मैं गाड़ी साइड में लगा ही रहा था कि देखा यें घबराई हुई और गुलाल में डूबी हुई गाड़ी की तरफ़ तेज़ी से आ रही हैं। उनकी शक़्ल देखते ही मैं समझ गया कि कुछ ही पल में क्या हो गया। मैंने पूछा कि क्या आप ठीक हैं, कहीं चोट तो नहीं लगी? मग़र कुछ कहे बग़ैर वें झट से गाड़ी में बैठ गयीं। मुझे भी ज़्यादा कुछ समझ ना आया और मैंने गाड़ी थोड़ी आगे कुछ सुरक्षित स्थान की ओर ले ली। कुछ देर बाद जब वें थोड़ी स्थिर अवस्था में पहुँची तब बोलीं कि जब मैं गाड़ी से उतर कर वहाँ पहुँची तो अचानक कुछ लोगों ने मुझे गुलाल लगाना शुरू कर दिया, मुझे ये चीज़ अच्छी लगी और रोमांचित कर रही थी कि तभी अचानक कुछ लोगों ने मुझे घेर लिया और बदतमीज़ी करने लगे। उसी पल मुझे तुम्हारी सलाह और ख़ुद की ग़लती का अहसास हुआ और मैं वहाँ से किसी तरह निकल के गाड़ी की ओर वापस आ गयी।

ये कुछ पल हमारा बाक़ी का दिन ख़राब करने के लिए काफ़ी थे और शायद भारत के प्रति उनका नज़रिया बदलने के लिए भी।

ये एक साधारण मनुष्य की मनोस्थिति होती है कि वो किसी भी ग़लत कार्य के लिए किसी को दोषी ठहरा के ख़ुद को संतुष्ट करे। इस घटना में मैं भी दोषी ठहराया जा सकता हूँ, इसलिए इस घटना के असली दोषी को ढूँढने का काम मैं आपको सौंपता हूँ।

1) प्रथम भावी दोषी - क्यूँकि उस जगह तो उन्हें मैं ही लेकर गया था और जानता था कि ऐसा कुछ हो भी सकता है। मगर मैंने तो पहले ही चेता दिया था कि गाड़ी से बाहर मत निकलना।

2) द्वितीय भावी दोषी - वें ख़ुद जो कि मेरी सलाह के बावजूद गाड़ी से बाहर निकलीं और उस भीड़ तक गयीं।

3) तृतीय भावी दोषी - वो लोग जिन्हें आज तक हमारा समाज यही समझाता आया है कि भीड़ का कोई नाम नहीं होता और ख़ास तौर पर होली पर नाश करके किसी भी प्रकार का हुड़दंग मचाना उनका अधिकार है।

4) चौथा भावी दोषी - हमारी रूढ़िवादी वो सोच जो कि आज भी हमें सेक्स एजुकेशन को स्कूलों में लागू करने से रोक रही है। समाज में इस विषय पर खुल के बात करना भी पाप माना जाता है। फिर भी इस तरह की रोज़ अनेकों घटनाएँ दबा दी जाती हैं और आबादी बढ़ाने की दौड़ में हम सबसे आगे निकल आते हैं।

मेरी आप से गुज़ारिश है कि आप जिसे भी दोषी पाएँ उसका नाम कृपया करके नीचे कमेंट ज़रूर करें और हाँ ये भी लिखें कि आपने उसे क्यूँ दोषी माना।

* पदमजा जी का बहुत-बहुत धन्यवाद जिन्होंने इस लेख को संपादित किया।

6 comments:

  1. Basically it's everyone's fault and no one to be blamed.
    You people were at the wrong place at the wrong time.
    Thank God that nothing very serious happened and she is safe . Shaken but safe and hope she leaves India with a smile on her face .

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  2. दोषी वही सोच है जिससे अपने पहले उनको आगाह कर दिया था। उस सोच से ही सही, हमारे समाज हमारा देश बार बार शर्मसार हो रहा है, इस सोच को कब तक झेलना पड़ेगा या ऐसी स्थितियों का सामना कर के कब तक देश का नाम बिगाड़ा जायगा, कहना मुश्किल है।

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  3. This is sad and shameful. :-(( I hope she can forgive and get over this incident--although it's highly unlikely she'll every forget. The only people to Blame are the ones who harassed this lady. Nobody else.

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  4. मानव भैया,
    आपका दोषी ढूंढने निकला हूँ तो अजीब स्तिथी में खुद को पाता हूँ, जिस पृकार किसी के शब्द हैं कि
    "बुरा जो देखन मैं चला, बुरा मिला न कोय ।
    जो मैं देखा आपणे, मुझसे बुरा न कोय ।।"
    भैया एक आम सोच तथा न्यायसंगत तर्कनुसार वह भीड 'एक' दोषी, परन्तु हर उस ओर उॅगली उठाने वाला व्यक्ति उसी भीड और सोच के हिस्से से अछूता नहीं है ।

    अपृत्यक्ष व्दितीय दोषी आप दोनों हो, पृथम वह 'महिला' अधिक 'मित्र' कम चूॅकि वह मन की उव्दिग्नता से वशीभूत हो भीड का हिस्सा बनने अथवा अपने अंदर के कलाकार की कुंठा को मिटाने के लिये अपने दायरे से बाहर चल निकली। "महिला के दायरे" की बात आते ही मॉ सीता के लिये खींची गयी लक्ष्मण रेखा का स्मरण हो आया ।

    खैर, मैं खुद को भटकने से बचाते हुए मुद्दे पर रहने की कोशिश करता हूँ तथा इस सामाजिक संरचना से पूर्वावगत आदिम जिसने अपना फर्ज़ सिर्फ एक चेतावनी भर तक समझा, के गिरेबॉ पे लगी थोडी कालिख पर रोशनी डालना चाहता हूँ।

    भैया, जिस पृकार जब तक हम, सभी समान विचारों की पूर्णता को पृाप्त हुए एक आदर्शवादी समाज या त्रुटिरहित वातावरण को पृाप्त नहीं कर सकते, तब तक हमें "अपने" समाज के दुःष्कलंको से बचने हेतु "अपने" तैयार किये गये मार्गों का दर्शन करना चाहिये । यहॉ "मार्गों" से मेरा तात्पर्य चेतावनी के बाद की जिम्मेवारी की ओर भी है ।

    समाज का बदलना एक जीवन पर्यन्त चलने वाली पृर्किया है। जिसमें हमारी पूर्व की कई पीढीयों के योगदान, वर्तमान के बहुत से NGO's, तथा निकट भविष्य के कई "Post, Tweets" शामिल होंगे ।
    फिलहाल हमें जरूरत है इस पृर्किया को समझने के लिये इस घटनारकृम को ऊपर से देखने की।
    उसी धुलंडी वाले दिन ही मेरी मॉ ने मेरे गले की सोने की चेन खींच ली, जिससे उनके अलावा अन्यत्र कोई ऐसा न कर पाये तथा मेरे बहुत मन में होते हुए भी मुझे फाल्गुन के इन मतवाले दिनों में दिवाली की अमावस रात्री की तरह कभी नये कपडे पहनने का शौक पूरा नहीं करने दिया जाता ।

    मानव भैया इसका दोषी में अपने बृज क्षेत्र अथवा भारतवर्ष को न ही दूँ तो अच्छा है, न्यायसंगत देखें तो आप इसे गलत ही पायेगें कि "public place" पर कभी तो लोगों को उनकी मर्जी के बिना "कैद" न करने की सलाह हम अपने अनुजों को बरबस ही दे दिया करते हैं। वहीं उन्हीं गलियों में हमें इसी "फाल्गुनी सैलाब" द्वारा मर्जी के मर्ज के बिना गंदे, मटमैले, रंगीन "धूल" तथा "पानी" से सराबोर कर दिया जाता है ।।

    परन्तु यह हमारे लिये त्रुटि का पर्याय नहीं वरन फाल्गुनी महात्म्य है। जिस बुध्दिमता से हम इस उद्धरण को समझ पायें हैं शायद उसी पृकार हम उस दुःघटना के त्रुटिरहित होने तक के समयकाल का अंदाजा लगा पायें ।

    तब तक "part of the game" !!
    और "game" को तो "rules" से ही खेला जाना चाहिये ।।
    Prashant Sharma :- व्यक्ता, होली में शामिल भंग और चंग को "रंगीन धूल तथा पानी" के साथ ही "त्रुटि" में शामिल करते हुए संबोधन कर रहा है ।।कोशिश 🙏🏼

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  5. मानव भैया,
    आपका दोषी ढूंढने निकला हूँ तो अजीब स्तिथी में खुद को पाता हूँ, जिस पृकार किसी के शब्द हैं कि
    "बुरा जो देखन मैं चला, बुरा मिला न कोय ।
    जो मैं देखा आपणे, मुझसे बुरा न कोय ।।"
    भैया एक आम सोच तथा न्यायसंगत तर्कनुसार वह भीड 'एक' दोषी, परन्तु हर उस ओर उॅगली उठाने वाला व्यक्ति उसी भीड और सोच के हिस्से से अछूता नहीं है ।

    अपृत्यक्ष व्दितीय दोषी आप दोनों हो, पृथम वह 'महिला' अधिक 'मित्र' कम चूॅकि वह मन की उव्दिग्नता से वशीभूत हो भीड का हिस्सा बनने अथवा अपने अंदर के कलाकार की कुंठा को मिटाने के लिये अपने दायरे से बाहर चल निकली। "महिला के दायरे" की बात आते ही मॉ सीता के लिये खींची गयी लक्ष्मण रेखा का स्मरण हो आया ।

    खैर, मैं खुद को भटकने से बचाते हुए मुद्दे पर रहने की कोशिश करता हूँ तथा इस सामाजिक संरचना से पूर्वावगत आदिम जिसने अपना फर्ज़ सिर्फ एक चेतावनी भर तक समझा, के गिरेबॉ पे लगी थोडी कालिख पर रोशनी डालना चाहता हूँ।

    भैया, जिस पृकार जब तक हम, सभी समान विचारों की पूर्णता को पृाप्त हुए एक आदर्शवादी समाज या त्रुटिरहित वातावरण को पृाप्त नहीं कर सकते, तब तक हमें "अपने" समाज के दुःष्कलंको से बचने हेतु "अपने" तैयार किये गये मार्गों का दर्शन करना चाहिये । यहॉ "मार्गों" से मेरा तात्पर्य चेतावनी के बाद की जिम्मेवारी की ओर भी है ।

    समाज का बदलना एक जीवन पर्यन्त चलने वाली पृर्किया है। जिसमें हमारी पूर्व की कई पीढीयों के योगदान, वर्तमान के बहुत से NGO's, तथा निकट भविष्य के कई "Post, Tweets" शामिल होंगे ।
    फिलहाल हमें जरूरत है इस पृर्किया को समझने के लिये इस घटनारकृम को ऊपर से देखने की।
    उसी धुलंडी वाले दिन ही मेरी मॉ ने मेरे गले की सोने की चेन खींच ली, जिससे उनके अलावा अन्यत्र कोई ऐसा न कर पाये तथा मेरे बहुत मन में होते हुए भी मुझे फाल्गुन के इन मतवाले दिनों में दिवाली की अमावस रात्री की तरह कभी नये कपडे पहनने का शौक पूरा नहीं करने दिया जाता ।

    मानव भैया इसका दोषी में अपने बृज क्षेत्र अथवा भारतवर्ष को न ही दूँ तो अच्छा है, न्यायसंगत देखें तो आप इसे गलत ही पायेगें कि "public place" पर कभी तो लोगों को उनकी मर्जी के बिना "कैद" न करने की सलाह हम अपने अनुजों को बरबस ही दे दिया करते हैं। वहीं उन्हीं गलियों में हमें इसी "फाल्गुनी सैलाब" द्वारा मर्जी के मर्ज के बिना गंदे, मटमैले, रंगीन "धूल" तथा "पानी" से सराबोर कर दिया जाता है ।।

    परन्तु यह हमारे लिये त्रुटि का पर्याय नहीं वरन फाल्गुनी महात्म्य है। जिस बुध्दिमता से हम इस उद्धरण को समझ पायें हैं शायद उसी पृकार हम उस दुःघटना के त्रुटिरहित होने तक के समयकाल का अंदाजा लगा पायें ।

    तब तक "part of the game" !!
    और "game" को तो "rules" से ही खेला जाना चाहिये ।।
    Prashant Sharma :- व्यक्ता, होली में शामिल भंग और चंग को "रंगीन धूल तथा पानी" के साथ ही "त्रुटि" में शामिल करते हुए संबोधन कर रहा है ।।कोशिश 🙏🏼

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  6. इस लेख को लिखने का फ़ायदा ज़्यादा है मैं अब से पेपर स्प्रे के इस्तेमाल से कुछ अच्छा इजाफा करुँगी साथ ही लोगो को उन्ही की भाषा में किस तरह बताया जा सकता है यह भी
    आपके ३ 4 भाव दोष से सहमत हूँ किन्तु समाज में जो भी होता है उसका सारा दोष हमारा अपना है अगर हम अपने लिये आवाज नही उठा सकते या कानून का सहरा लेने के ख्याल से भी हमे समय का ध्यान आता है तो हम गलत है समस्या का समाधान वक्त रहते हमे याद रह जाए तो सही है
    IPC sec 354 A 354 B को पढने की सख्त जरुरत है हम सभी को खास तोर पे
    pachisia (You people were at the wrong place at the wrong time.
    Thank God that nothing very serious happened and she is safe . Shaken but safe and hope she leaves India with a smile on her face .)
    serious की परिभाषा rape है भारत में sexual harassment शब्द जो की educated लोगो को भी नही पता और अब अपने ही जयपुर में हमे समय देख के घर से बहार निकलना होगा ? जो हुआ शयद वो फ़ोटोग्राफ़र वकत के साथ भूल जाएँ वो मगर Thank God that nothing very serious happened इसको भूलना तो मेरे लिये ही असम्भव है !

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