Tuesday, 29 December 2015

Caught in Act, Street Photography Jaipur.

After the day’s hard work this guy was washing his face and I was on the hunt. Capturing these kind of moments – emotions is also one of the reasons why I love street photography. I took this shot at Johri Bazar, Jaipur.

Monday, 28 December 2015

अद्रिशय गठरी।

कल में बहुत ही आसान सोच के साथ शहर में फोटोग्राफी करने निकला था। मगर जैसे ही मैंने एक दिन भर के थके - हारे मजदूर को अपने बोझे की गठरी कंधे पे लादे घर की और वापस जाते देखा मेरी सारी आसान सोच मुशकिल बन गयी। सबसे पहले तो मैंने उस मजदूर के बजाये उसकी परछाई की तस्वीर ली। बात इत्निसी हे की अब ये परछाई किसी की भी हो सकती हे शायद मेरी भी। मगर ये जो बोझ की गठरी मेरी परछाई में दिख रही हे वो मुझे आईने में तो नहीं दिखती मगर महसूस हर पल होती है। जो गठरी मुझे दिख नहीं रही सिर्फ महसूस हो रही हे उस गठरी में भरा क्या हे ये जानना तो अब बहुत ही आवश्यक हो चूका है। मैंने धुंए का एक लम्बा काश लिया और उस अद्रिशय गठरी को कंधे से उतार कर सामने रखा। धीरे से उस गठरी को खोला और हाथ अन्दर डालने ही वाला था के याद आया की गाडी की चाबी तो मैं गाड़ी में ही लगी छोड़ आया। मैंने खट से गठरी बांधी कंधे पे डाली और गाड़ी से चाबी लेने चल दिया।

Friday, 11 December 2015

सर्दी की बेरंग रात।

Street life at night in Jaipur
मैं पिछले कुछ दिनों से कुछ कामों में कुछ नाकामों में व्यस्त था, इस लिए रात्रि छायाचित्र टहल के लिए भी समय नहीं निकाल पाया। किन्तु परंतु किन्तु कल रात वक़्त निकल ही आया और मैं भी अपनी प्रतिबिम्बि लेने की पेटी ले के पुराने शहर की तरफ निकल पड़ा।

रात थोड़ी सर्द तो पहले से थी और मैंने सोचा जब तक मैं शहर पहुंचूंगा सर्दी थोड़ी और सर चढ़ जाएगी। ऐसे में खुले आसमां के निचे सोने वाले दिन भर के थके हारे लोग अलाव जला कर सोने की तइयारी कर रहे होंगे। इस सब को अपनी प्रतिबिम्ब लेने की पेटी में कैद करने में अलग ही आनंद आएगा। मगर जब मैं शहर पहुंचा तो मेरा दिल ही टूट गया।

पहला: शायद खुले आसमां के निचे सोने वालों के लिए इतनी ठंड नहीं आई थी की उनको अलाव की जरुरत पड़ती।

दूसरा: हमारे जयपुर शहर में पिछले कुछ दिनों मे विकास के नाम पे सरकार ने पथ पे जलने वाले बेडौल से मोटे प्रकाशपुंजों को, जो की आधी अधूरी सी पीली कुछ नारंगी सी रौशनी देते थे, जिन्हें सर्दी की धुंद भरी रातों में देख कर कुछ गर्मी का अहसास भी होता था। को नयी पतली सुडोल प्रकाश उत्सर्जक डायोड प्रकाशपुंजियों से बदल दिया है। जो की बिजली भी बचाती हे और रोशनी भी जयादा देती है। मगर इन सफ़ेद चमकदार प्रकाशपुंजियों ने मुझ जैसे छायाकार की जिंदगी से सर्दी की रातों के वो गर्म पीले रंग छिन लिए हें जिन्हें मैं मेरी प्रतिबिम्ब लेने की पेटी में कैद करने के लिए रातों को भटकता रहता था।